Jumerat ki fazilat | Jumerat ki raat ka wazifa | जुमेरात की फजीलत |Peer or Jumerat Ka roza Ki Fazilat

Jumerat ki fazilat| जुमेरात की फजीलत

Jumerat ki raat ka wazifa

Peer or Jumerat Ka roza Ki Fazilat  

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👉 जुमरोत का दिन बहुत ही मुबारक दिन है और हफ्ते के तमाम दिनों में इसे बड़ी फजीलत हासिल है। हदीसे पाक में जुमेरात की रात को रोशन रात फरमाया गया है। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अल्लाह तआला के नजदीक कोई दिन और रात जुमेरात और जुम्आ के बराबर नहीं। 
(जामेअ सगीर जि. 5 पे 372)

👉 जुमेरात के रोज़ बन्दों के आमाल बारगाहे खुदा में पेश किये जाते हैं तो अल्लाह करीम जपने करम से उनकी मग़फिरत फरमाता है सिवाए उन लोगों के जो आपस में नफरत रखते हों या रिश्तेदारी काटते हों।

👉इसी तरह जुमेरात के रोज जन्नत के दरवाजे खोले जाते हैं और मोमिन बन्दों की मग़फिरत की जाती है सिवाए उसके जो किसी भाई से दुश्मनी रखता हो। अगर वह आपस में सुलह कर लेते हैं तो उनकी भी मगफिरत हो जाती है।

 👉जुमेरात के दिन सफर करना बरकत का सबब है।

👉 अगर किसी शख्स की हाजत पूरी न होती हो तो उसे जुमेरात के रोज तलब करे। इन्शाअल्लाह हाजत जरूर पूरी होगी।

👉 जुमेरात के दिन नाखुन वगैरह काटना चाहिये।

👉 जुमेरात की रात "हा मीम दुखान" सूरह की तिलावत से घर में बरकत आती है। इसके पढ़ने वाले की बख़्शिश होती है और उसके लिये जन्नत में महल तैयार होता है।

जुमेरात का रोज़ा



       हजरत इमाम गजाली रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि हफ्ते में तीन दिन बड़ी बुजुर्गी वाले हैं यह दिन पीर, जुमेरात, जुम्आा है। इन दिनों में रोजा रखना मुरातहब है जिसका सवाब इनकी बरकतों से बहुत मिलता है।
(अहयाउल उलूम जि.1 पे.244
       हदीस शरीफ में है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सोमवार और जुमेरात का रोजा रखते थे। जब इस बारे में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया तो आपने इरशाद फरमाया कि सोमवार और जुमेरात को बन्दों के आमाल रब तआला की बारगाह में पेश किये जाते हैं। इस बात को में पसन्द करता हूँ कि जब मेरे आमाल बारगाहे ख़ुदा में पेश किये जाएँ तब में रोज़े से रहूँ।

जुमेरात के दिन के नवाफिल नमाज़

     सय्यदना अब्दुल्लाह रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि रसूले खुदा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो शख्स जुमेरात के रोज ज़ोहर व अस्र के दरमियान दो रकात नमाज़ इस तरह पढ़े कि पहली रकात में सूरह फातिहा के बाद आयतल कुर्सी 100 बार पढ़े। दूसरी रकात में सूरह फातिहा के बाद सूरह इख़्लास 100 बार पढ़े।

     नमाज़ से फारिग होने के बाद 100 बार दरूद शरीफ पढ़े तो अल्लाह तआला उसको रजब, शअबान, रमजान के रोजा रखने वालों के बराबर सवाब अता फरमाएगा और उसको इतना सवाब दिया जाएगा जितना खाना-ए-काबा के हाजियों को मिलता है और दुनिया में जितने मोमिन हैं उनकी तादाद के बराबर नेकियाँ लिखी जाती हैं।
(अहयाउल उलूम जि. 1 पे.205)

जुमेरात की रात के नवाफिल नमाज़


 👉अहयाउल उलूम और गुनयतुत्तालिबीन में है कि सरकारे मदीना सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो शख्स जुम्आ की रात को मग़रिब और इशा के बची दो रकात नमाज़ इस तरह पढ़े कि हर रकात में सूरह फातिहा के बाद 5 बार आयतल कुर्सी और 5 बार सूरह इख्लास और 5 बार सूरह फलक व सूरह नास पढ़े।

       जब नमाज से फारिग हो तो 15 बार इस्तिगफार पढ़े और उसका सवाब अपने वाल्दैन को बख्शे तो ऐसा करने से उसने अपने माँ बाप का हक अदा कर दिया अगरचे वह उनका ना फरमान भी रहा हो, और अल्लाह तआला उसको सिद्दीक़ों और शहीदों का सवाब अता फरमाता है।

 👉 हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि अगर कोई आदमी जुम्आ की रात मग़रिब और इशा के बीच 12 रकात दो दो कर के इस तरह पढ़े कि हर रकात में सूरह फातिहा के बाद सूरह इख्लास ग्यारह बार पढ़े।
      तो उसे 12 साल दिन में रोज़ा रखने का और 12 साले रातों में इबादत करने का सवाब मिलेगा।

(अहयाउल उलूम जि 1 पेज 206)

Note:- नाज़रीन ये था Jumerat ki fazilat|जुमेरात की फजीलत| दिनों की फजीलत

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जज़ाक़ अल्लाह



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